Winning Entries of Atal Bihari Vajpayee Smriti Kavya Pratiyogita by Kavish-e-Kalam (Part One)

अटल व्यक्तित्व: वंशज का प्रणाम

अभिलाषाओं की विभूतिओं पर राजनीती का दंश दिखा,
नैतिकाओं की तरल वाणी को कायर कहता वंश दिखा,

कौन लिखेगा टूटी चूड़ी, विधाओं के माथे का शोणित,
कौन रखेगा लाज वाणी की मर्यादाओं को कर संजोहित,

कौन यहाँ किसके कारण खुद को आबाद करेगा फिर,
समय तुला के मापदंड से आगे बढ़ विवाद करेगा फिर,

कहा गए वो टूटी लाठी वाले बाबा, भारत विचार करो,
विभूतिओं को गिनने से पहले दर्जे के अनुसार करो,

कैसा समाज बनाने वाले थे वो, आखिर कहाँ गए,
नेताओं की महासूची में अटल धरातल पाट रहे,

किसको याद किसकी वाणी, मनु ही ज़ब संहारक हो,
कैसा विनीत, कैसा कोमलपन, शोर जहाँ अनुनायक हो,

ज़ब चौराहे लज्जित हो दरबारों की मर्यादाओं से,
क्या फिर दीप लड़ेगा ज़ब दिनमान घिरे विपदाओं से,

कहाँ शोर मैच रहा के खोलो, सड़कें चीख चिल्लाती हैँ,
और प्रलय के घोर गरंजन से सीमाएं घबराती हैँ,

चलो के सैंतालीस की आजादी, एक मौन संवाद लिखें,
क्यों लिखें मधु के घाट, विवाद पर जो हुआ विवाद लिखें,

लिखें के जे पी के आँसू नीलाम हुए हैँ, संकल्पों में,
और लोहिया थक गए बना समाज नवीन विकल्पों में,

गाँधी को कर याद चलो, राजघाट के पुष्प तरल,
जहाँ अभी तक वाणी कंपती, शब्द परन्तु पुण्य गरल,

आओ दिनकर के रथी, निराला की अपूरित प्रतीक्षा रखें,
हरिवंश राय के बोल, नागार्जुन की क्षणिक शिक्षा रखे,

प्रेमचंद गौदान रखें, तुलसी की रामचरितमानस हो,
महादेवी वर्मा लीन तपस्विनी, दुष्यंत कुमार सा साहस हो,

वहीं आग से फूल फूलती, बदली, बिजली, चिंगारी हो,
चिमटे से अपमानित कुर्सी त्याग, खड़े अटल बिहारी हों,

सिद्धि मृत्यु से बड़ी हुई हो, हार जो ना घबराती हो,
घोर तिमिर में प्रज्वलित हुआ, कोलाहल रोक ना पाती हो,

हर नहीं मानी जिसने, रार कहाँ अटल ने ठानी,
छोटे कद के अवतारों से, लिखदी एक उत्कृष्ट कहानी,

संसद को कर मंदिर ज़ब, कवि मंचों की आवाज़ उठी,
अटल वाणी घर घर गूंजी, यु एन में हिंदी की परवाज़ उठी,

पुष्प नहीं लगते पेड़ पर, बरस बरस तपती जड़ सह धूप,
राजनीती में ज्यों तपे, अटल तो कमल ने आज लिया स्वरुप,

लेकिन कथा दारुण जिसकी, उसका बलिदान उचित उतना,
जो धूल में लिखा पढ़ा, कायाकल्प विधान स्वरचित उतना,

मैं साहस में बोल गया, हिंदी के गौरव की गौरव गाथा,
किसके चित्त में बल इतना, अटल तुम्हे जो गा पाता,

अक्षर के आराध्य, समय की सीमा का उदबोधन हो,
दो सदियों को बांध रहा, वह आत्मीय सम्बोधन हो,

तुम देवों की लोक सभा के, जननायक यशक्रेता हो,
भूमण्डल की समस्त योनिओ के संबल के नेता हो

-Anirudh Tyagi, 2nd Year B.A.LLB. Student


फूल और कलम

श्रोता को लगता है कि कविताएँ तब लिखि जाती है जब फूल खिलते है,
पर कवि बनकर मैने जाना की ये अधूरा सच है,
कवि की रूचि फूल होते है,
कविताएँ भी वो फूलों पे लिखते है,
पर कलम की स्याही से शब्द तब निकलते है जब दिल का फूल मुरझाता है, जब कोई ठेस लगती है, सपना अधूरा रह जाता है, जब हृदय भावनाओं के समुंदर में डूबा होता है,
पर मुख से निकले शब्द असफल हो जाते है,
तब जिंदगी रूपी प्रेमिका के द्वारा ठुकराया हुआ कवि अपनी माता रूपी कलम के पास आता है,
और गोद में व्यथा व्यक्त करके सो जाता है |

-Nandini, 1st Year B.A.LLB. Student


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