– धर्मेश बसेड़िया
मेरा दिल अब टूट गया, हर दिन मुझसे रूठ गया,
हमेशा रहना तो हो ना सका, सुकून भरी उस शाम को मैं सो न सका।
एक यौवन की किलकारी थी, जो सदैव मुझे भाती थी, संसार की खोज में अंधकारमय हो जाती थी,
शाम सवेरे मिलना था, अभी तो बहुत कदम बढ़ना था, एक दिन एक चूक में, पूरा उसका संसार हिलना था।
रुक गयी जब साँसे उस दिन, थर–थर दिल ये काँप गया, पता नहीं कैसे ईश्वर, मेरी बच्ची को ही श्राप गया ,
तुमने उसको छीन लिया, ऑक्सीजन नहीं थी यही सरकार ने ढील दिया।
रेम्देसिविर की लड़ाई में, मैं घंटो लाइन में रहता था,
कालाबाजारी के साये में, उसका जीवन सोता था।
उस हॉस्पिटल की भीड़ में लाखो आँसुओं की होड़ थी,
पी०पी०ई० किट पहने कई अनजान लाशें मौन थी।
इस त्राहि में भी, बिचौलियों की लालसा रुक न सकी,
उन लोगो को भी शायद अपना घर पालना होगा, यह बात मुझसे पच न सकी।
सरकार की वैक्सीन उसे भी लगवानी थी, हुआ यूँ की वो न मिलने पर,
उसकी जान महज़ एक कुर्बानी थी।
जब चढ़ गयी भेंट यमराज को, बिलखता पूरा मोहल्ला था,
अगली बार किसे वोट देंगे, यह ही पूरे देश में हल्ला था।
पर जब जब सरकार के लोग आते थे, मेरी रूह को तड़पाते थे,
यह कोविड बड़ा ही अत्याचारी हैं, बस उसे ही बतलाते थे।
उसके खिलौने संदूक में, मैं आज भी देखने जाता हुँ,
क्या पता मेरी ख़ुशी लौट आये, यह ही तर्क लगाता हुँ।
उसका वापस आना अब रेत में पानी के होने समान लगता है,
पर आज भी घर में घंटी बजे, तो उसका अनूठा आगमन सा होता हैं।
यह त्रासदी ने सबका कुछ न कुछ छीन लिया,
मेरा ह्रदय मुझसे लिया और क्षीण दिया।
अब यह दिल–न–उम्मीद, कई सालों तक गुज़रेगी,
उसकी यादों में न जाने और कितनी रातें मेरी बिखरेंगी।
हिम्मत से काम लो यह उसने कहा था, शायद यहीं उसका मुझसे आखिरी शब्द हुआ था,
यह भारत देश ने उसे खो दिया, एक नवनिर्माण को शून्य दिया।
मेरे परिवार के बोझ को उसको हल्का करना था, सबसे बड़ा बलिदान आखिरकार उसको ही करना था,
ख़ैर मेरा दिल अब टूट गया, हर दिन मुझसे रूठ गया |
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(Dharmesh is a super-fan of Nawazuddin and still believes tremendously in 1990s which can be accredited to the fact that he finds pleasure while listening to Jaun Eliya and Jagjit Singh. You can follow him on Instagram)

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